Thursday, April 26, 2018

रंग!

ये जो भाँती भाँती के रंग है,
लड़ते मरते है क्या हमारी तरह?
भेद तो इनमे भी है,
कोई काला है तो सफ़ेद कहीं,
फिर भी घुल-मिल जाते हैं बादलों में सभी!
पेड़ का पत्ता जो पीला था, 
आज हरा और कल भूरा होगा,
फिर भी मदमस्त हवा में है बेफिक्र झूम रहा!
नीला आकाश, हरा समंदर , इत्मीनान से है रह रहे,
अलग अलग है प्रकर्ति के रंग,
फिर भी खुश और मिल-जुल है रह रहे!
इंसान के खून का रंग तो एक है,
फिर भी क्यों हम लड़-मर रहे, क्यों हैं हम यूँ जुदा-जुदा?

- प्रशांत गोयल!

Wednesday, April 25, 2018

एक पुरानी याद!


बहुत पुरानी बात है,
बात कहूं या याद,असमंजस में हूँ,
धुंदली सी तस्वीर है आँखों के आगे,
याद ही होगी, बातों का क्या है,
सुनने वाले मिल जाए, सब किया करते हैं,
मुझे ही देख लो,
मैं भी करने लगा, याद को भुला के!

याद से याद आया,
किसी रोज़ एक तितली को दफनाया था,
एक पेड़ के नीचे, मिट्टी के पीछे,
दो सफ़ेद फूल भी चढ़ाये थे,
कोरे रंग की रेत से कब्र भी बनाई थी,
पैरों के नीचे ना कुचल जाये कहीं, डर जो था,
और फिर मैं अपनी बातों में उलझ गया!

आज अरसे बाद वहां से गुज़रा तो,
ना पेड़ था, ना कब्र थी,
एक लम्बी ईमारत  खड़ी थी,
ना जाने कितनी कब्रों के ऊपर,
तितली की या इंसानो की ब्यान नहीं कर सकता!

- प्रशांत गोयल