Thursday, January 14, 2010

नियम!


धीरे धीरे सूरज, सागर में समानें लगा,
अन्धकार धीरे धीरे छाने लगा,
तारों का आँचल टिमटिमाने लगा,
चाँद बिंदी कि तरह, कहीं चमक रहा,
पथिक अपनी अपनी राह वापिस जाने लगा,
ये एक नियम है,
सूरज तो मात्र छिप गया
कल फिर आएगा.....

सोच!!


ना चाहते हुए भी, मन मेरा सोचता है,

कुछ बातें याद आती हैं,

मन भर आता है,

सोचने से कुछ नहीं होता, मेरी सोच है,

लेकिन, ये मन फिर भी सोचता है,

सोचता हूँ कि ना सोचूँ??


इंतज़ार


खुशियों कि महक हर तरफ से आ रही है,
क्यूंकि हर तरफ कुछ खुशियाँ बह क जा रही है,
मैं किस तरफ हूँ?
हवा का रुख कुछ अलग सा क्यूँ है इधर?
कईं उममीदें, कईं ख्वाब, कुछ मुस्खुअरातें,
हर रोज़ निकलते हैं मेरे दामन से,
और मैं हूँ कि हर पल, हर घडी...
... ज़िन्दगी के इंतज़ार में हूँ!